जब एक साधारण व्यक्ति के सोचने समझने की क्षमता ख़त्म हो जाये, क्या करना उचित होगा और क्या अनुचित; जब इनमें भेद करना नामुमकिन सा लगने लगे, जब साफ़ रास्ते भी धुंधले दिखें और जब एक भय मन में इस तरह आ जाये कि वह आपको कुछ करने से रोकने लगे तब यह नकारात्मकता की स्थिति होती है । तमाम बार हमारे नकारात्मक विचार हमारी सकारात्मकता पर ज़्यादा प्रभावी हो जाते हैं । ऐसे में कोई क्या करे जब उस पर नकारात्मकता हावी हो । जब रास्ते साफ़ न दिखाई दे रहे हों तब कोई क्या करे ? ऐसे अनगिनत प्रश्न हैं जिनका उत्तर तो हमारे सामने ही होता है लेकिन वो हमें दिखाई नहीं देता । अंधेरा कितना भी घना क्यों न हो प्रकाश की एक छोटी सी किरण ही उसे चीर देती है । नकारात्मकता भी वही घना अंधेरा होता है जिसे सकारत्मकता की एक छोटी किरण ख़त्म कर सकती है । किन्तु नकारत्मकता की उस स्थिति में एक भी सकारात्मक विचार नहीं आ पाते, ऐसे में क्या किया जाए ? कभी हमने उस वृक्ष के बारे में सोच है जो पत्थर को चीरकर निकलता है या कभी उन लहरों के बारे में जो सतत और अथक प्रयास से पत्थर को भी काट देती हैं । तमाम बार वह हर कुछ हमारे सामने होता जिसकी हमें तलाश होती है किंतु हम इतने निराश होते हैं कि हम वह सब कुछ देख ही नहीं पाते । हर विषम परिस्थिति में अपने आप को शांत रखना प्रकृति में पूर्ण आस्था रखना और आने वाले कल में अटूट विश्वास रखना ही सकारात्मकता तक ले जाने का एकमात्र उपाय है । हर विषम परिस्थिति में धैर्य बनाए रखना, सकारात्मकता के साथ उसका हल ढूढ़ना और प्रकृति पर विश्वास रखते हुए साधना पथ पर चलते जाना ही जीवन है..............(जारी)

विनम्रता और सकारात्मक सोच किसी को भी आगे बढ़ सकती है।
ReplyDeleteबहुत खूब लिखा है।
अच्छा लेख प्रिय अनुज,,
ReplyDeleteThank you, bahut hi achcha lekh hai bahut bahut dhanyawad man mein sakaratmakta jagane k liye
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