Sunday, March 3, 2019

जीवन (1)

जब एक साधारण व्यक्ति के सोचने समझने की क्षमता ख़त्म हो जाये, क्या करना उचित होगा और क्या अनुचित; जब इनमें भेद करना नामुमकिन सा लगने लगे, जब साफ़ रास्ते भी धुंधले दिखें और जब एक भय मन में इस तरह आ जाये कि वह आपको कुछ करने से रोकने लगे तब यह नकारात्मकता की स्थिति होती है । तमाम बार हमारे नकारात्मक विचार हमारी सकारात्मकता पर ज़्यादा प्रभावी हो जाते हैं । ऐसे में कोई क्या करे जब उस पर नकारात्मकता हावी हो । जब रास्ते साफ़ न दिखाई दे रहे हों तब कोई क्या करे ? ऐसे अनगिनत प्रश्न हैं जिनका उत्तर तो हमारे सामने ही होता है लेकिन वो हमें दिखाई नहीं देता । अंधेरा कितना भी घना क्यों न हो प्रकाश की एक छोटी सी किरण ही उसे चीर देती है । नकारात्मकता भी वही घना अंधेरा होता है जिसे सकारत्मकता की एक छोटी किरण ख़त्म कर सकती है । किन्तु नकारत्मकता की उस स्थिति में एक भी सकारात्मक विचार नहीं आ पाते, ऐसे में क्या किया जाए ? कभी हमने उस वृक्ष के बारे में सोच है जो पत्थर को चीरकर निकलता है या कभी उन लहरों के बारे में जो सतत और अथक प्रयास से पत्थर को भी काट देती हैं । तमाम बार वह हर कुछ हमारे सामने होता जिसकी हमें तलाश होती है किंतु हम इतने निराश होते हैं कि हम वह सब कुछ देख ही नहीं पाते । हर विषम परिस्थिति में अपने आप को शांत रखना प्रकृति में पूर्ण आस्था रखना और आने वाले कल में अटूट विश्वास रखना ही सकारात्मकता तक ले जाने का एकमात्र उपाय है । हर विषम परिस्थिति में धैर्य बनाए रखना, सकारात्मकता के साथ उसका हल ढूढ़ना और प्रकृति पर विश्वास रखते हुए साधना पथ पर चलते जाना ही जीवन है..............(जारी)

Saturday, March 2, 2019

आत्म संवाद (1)

क्यों न फ़िर से एक नई कहानी शुरू की जाए । क्यों न फ़िर से एक दूसरे से जुड़ने का ज़रिया निकाला जाए । क्यों न शाम को चौपाल पर बैठकर सबका दुःख दर्द बांटा जाए और क्यों न अपने अंदर के मानवीय गुणों को बाहर निकाला जाए । हम दूसरों से अपेक्षा क्यों करते हैं ? क्या सिर्फ़ इसलिए कि हम मदद स्वयं करने के योग्य नहीं या हम पूरी तरह दूसरों पर निर्भर होना चाहते हैं ? क्यों न कुछ ऐसे प्रश्नों के हल ढूंढने के प्रयास किया जाए जो सिर्फ़ हमें पता है । अगर हम अपने प्रति ईमानदार नहीं हैं तो हम दूसरों के ईमानदार होने की कल्पना भी कैसे कर सकते हैं । बुराईयां और परेशानी कहां नहीं है ? अगर जीवन में उतार चढ़ाव नहीं है तो कैसा जीवन ? चलो ख़ुद से एक प्रश्न करते हैं कि क्या हम वास्तव में वही हैं जो हमें देख या समझ रहे हैं ? क्या हम वास्तव में वही कर रहे हैं जो हमें करना था ? क्या हम उसी राह पर हैं जो हमें हमारी मंज़िल तक ले जाएगी ? ऐसे न जाने कितने प्रश्न हैं जिनका उत्तर खोज़ना शायद बेहद जरूरी है । तो क्या हम अपने निर्माण की राह पर हैं या हमें स्वयं को तलाशने की आवश्यकता है ? आत्म संवाद अत्यंत आवश्यक है । कुछ पल के लिए स्वयं को इस भौतिक संसार से अलग मानकर क्यों न इन प्रश्नों के उत्तर की तलाश की जाए ? या जीवन सिर्फ़ अपेक्षाओं पर चलेगा ? शायद स्वयं का निर्माण नितांत आवश्यक है । क्यों न एक यात्रा स्वयं के तलाश की हो..............(जारी)

Monday, May 21, 2018

मैं वेदना की गहराई लिखता हूं

शब्द मेरे हम इंसानों सा रोते हैं
मैं वेदना की गहराई लिखता हूं ,

उजाले में हर कोई साथ चलता है
अंधेरों में भी मैं परछाई लिखता हूं ,

अपने दुःख में मैं चुप हो जाता हूं
दूसरों के सुख में शहनाई लिखता हूं ,

मैं चुप होके भी कुछ कह जाता हूं
ऐसे एहसासो की करिश्माई लिखता हूं ,


जो न हो सबके हित और पक्ष में
ऐसी वृद्धि को मैं महंगाई लिखता हूं ,

उजालों तक ही हों जो सीमित कदम
इसको ही स्वार्थ पूर्ण हिताई लिखता हूं,

जहां पवित्र हो जाये आत्मा मिले शांति
उनको ही मैं सावन रमजायी लिखता हूं ,

जहां न हो भेदभाव न कोई ऊंच नीच
ऐसे व्यवहार को प्रभुताई लिखता हूं ,

दिल का सरल होना भी बेहद जरूरी है
सबके हृदयं में एक नरमाई लिखता हूं ,

बात जहां हो सम्मान के रक्षा की
उस स्थिति में मैं कड़ाई लिखता हूं ,

कठिन परिस्थितियों में सरल व्यवहार
ऐसे मनः दशा को चतुराई लिखता हूं ,

मैं इंसानों को भी पर दे दूं परिंदों सा
फ़िर आकाश कोअनंत ऊंचाई लिखता हूं ,

जहां से करें मानवता का अमृतपान हम
गुरुबान क़ुरान गीता व चौपाई लिखता हूं ,

मानव सेवा ही मेरा धर्म रहा सदा से ही
मैं तो रब ख़ुदा ईश रघुराई लिखता हूं

अच्छों के साथ अच्छा बुरों के साथ भी
देखा हरदम अच्छा है न बुराई लिखता हूं ,

जिस मचान पर ठिठुर गयी ख़ुद सर्दी भी
उस ठिठुरन को ही मैं रज़ाई लिखता हूं ,

जब स्वार्थ ही नींव हो जाये रिश्तों की
फ़िर इनसे मैं बेहतर तन्हाई लिखता हूं ,

जब भी निराश हो झगझोर दे मन को
एहसासों की ऐसे में गरमाई लिखता हूं ,

इस विस्तृत भू भाग की संरचना है अद्भुत 
पहाड़ों की ऊंचाई कहीं राई लिखता हूं ,

एक ऐसा स्वरूप जिसमे है निःस्वार्थ प्रेम
मां माता अम्मी कहीं माई लिखता हूं

बेनक़ाब चेहरों पर रंग नहीं चढ़ते हैं
सादगी को भी अलग रंगाई लिखता हूं ,

अपने दर्द में मैं चुप चाप रो लेता हूं
फ़िर दूसरों के दर्द की दवाई लिखता हूं ,

जहां बांध दे दीवारे चलने से हमें
वहां कुछ मार्ग हवाई लिखता हूं ,

तूफ़ानों की भीअपनी एक कहानी होती है
हवा के रुख़ को पुरवाई लिखता हूं ,

कुछ विरोभाष मन में जो छिपे हैं
मैं ऐसे विचारों की सफ़ाई लिखता हूं ,

खेल कभी कुछ एहसासों को तोड़ते है
मैं कुछ खेल तमाशाई लिखता हूं ,

जहां टूट जाये उम्मीद और हार जाएं हम
वहां मैं विश्वासों की भराई लिखता हूं ,

गिर जानेपर भी पेड़ों में शाख निकलती है
इसको ही क़ुदरत कीरहनुमाई लिखता हूं ,

इस प्रकृति का रहस्य अनन्त है यहाँ
कहीं नदियां पहाड़ कहीं खाई लिखता हूं ,

गलतियों को मैं अपनी कभी नहीं छुपाता
कभी हिसाब तोकभी भरपाई लिखताहूं ।

Sunday, April 8, 2018

एक लड़की है जो किसी को समझ नहीं आती है

अपने सरल भावों से वह सबके मन को भाती है
चुप रहकर भी न जाने क्या कुछ कह जाती है
अपनी हर ज़िद पर वह ख़ुद को ख़ुद ही बहलाती है
अपने हर सपने को बड़े प्यार से वह सहलाती है
अपनी उदासियों पर वह ख़ुद को ख़ुद ही समझाती है
अपनी ख़ुशबू से पूरे जहान को वह महकती है
अपनी उदासी को बड़े चालाकी से वह सबसे छुपाती है
एक लड़की है जो किसी को समझ नहीं आती है ।



वो रोती है फ़िर भी न जाने कैसे मुस्कुराती है
पल भर में ही वह किसी हवा सा बह जाती है
अपनी गलतियों को वह कभी नहीं छुपाती है
अपने अच्छे हुए कामों पर बस जरा सा मुस्कुराती है
किसी उदास को देख के ख़ुद भी उदास हो जाती है
कभी कभी अपने ही ख़यालो में वो खो जाती है
अपनी ठोकरों पर वह ख़ुद ही संभल जाती है
एक लड़की है जो किसी को समझ नहीं आती है ।

किसी के देखने से छुप और छूने से बिख़र जाती है
जब ख़ुश होती है तो भीड़ में भी निखर जाती है
कुछ पूछो तो उससे पहले ही चुप हो जाती है
बस एक निःस्वार्थ मुस्कान लेकर मुस्काती है
बस कभी कभी वह अपनी कहानियों को सुनाती है
अपने किसी भी दर्द को वह किसी से नहीं बताती है
एक लड़की है जो किसी को समझ नहीं आती है ।

Wednesday, April 4, 2018

मैं तप कर फ़िर अंगार बनूं

मैं नहीं चाहता जग में फ़िर
कहीं अलंकित नाम रहे
शांत सरल मृदुभाओं से ही
जगत प्रकाशित काम रहे
हो स्वेत वस्त्र सा मन मेरा
मैं विधवा का श्रृंगार करूं
मन को मैं उन्मादित करके
मैं तप कर फ़िर अंगार बनूं ।

चंदन का पुष्प सुगंधित हो
तन मन जग को वह महकाये
हो वायु सुगंधित भी उससे
हर मन को फ़िर वह बहलाये
मन के मलीन हर भावों का
सकुशल मैं भंगार बनूं
जीवन को आत्मसमर्पित कर
मैं तप कर फ़िर अंगार बनूं ।

सकुशल नीरव रस का प्रवाह
सुखी सरिता के जीवन में
पतझड़ का मौसम ही ठहरे
मेरे मन के सूखे वन में
मैं मन के अपने भावों का
अभेदित कारागार बनूं
प्रेम सहित सरिता वन फैले
मैं तप कर फ़िर अंगार बनूं ।

जीवन में प्रेम नहीं जिनके
मन उनका भी अनुरागी है
हो प्रेम यज्ञ का अनुष्ठान
हर जन उसमें प्रतिभागी है
इस प्रेम यज्ञ के अनुष्ठान में
मैं उसका सभागार बनूं
प्रेम प्रेम को कर आलंगित
मैं तप कर फ़िर अंगार बनूं ।

Monday, April 2, 2018

मेरे एहसास

मुझे नहीं पता था कि अपने दिखावे में मैं अपना अस्तित्व खो दूंगा
अपने अहंकार में कभी न पनपने वाले ऐसे भी बीज बो दूंगा
मुझे अब तक ऐसा नहीं लगता था कि मेरे साथ कुछ ऐसा हो सकता है
जो चीज़ उसकी हो ही न उसे कोई भला कैसे खो सकता है
कुछ बातें जो मुझे नहीं जाननी थी वो भी समझ आने लगीं थीं
हर बात के हमें एक अगल ही मायने समझा जाने लगीं थीं



मैंने कभी किसी से नहीं कहा कि मैं सर्वदा सही हूं
मैंने लोगों को जो कुछ भी  दिखाया है मैं वही हूं
किसी की भावनाओं के साथ खेलना मेरा पसंदीदा खेल तो नहीं
कोशिश करे और न समझ पाए कोई इतना भी उलझा मैं बेल तो नहीं
निःसंदेह कहीं न कहीं यह मेरी ही कोई गलती बड़ी रही होगी
यूं ही नहीं क़िस्मत सिर्फ़ मेरे ही लिए उस मोड़ पर खड़ी रही होगी
मैं रास्तों को अपनी मंज़िल समझ कर रुक गया था सुस्ताने के लिए
हां नहीं पता था बहाने को भी जरूरत होती है बहानो के लिए
चलो मैं तो ग़लत था कुछ समझदारी तुमने ही दिखाई होती
कुछ बातें जो मुझे ग़लत पता थी तुमने तो सही बताई होती 
मैं मानता हूं कि मेरा विश्वास एक पल के लिए हिल गया था
मगर उस पल को भी तो बस वही एक पल मिल गया था
मैं लाख कोशिशों के बाद भी कई बातें मानने के लिए तैयार नहीं था
मैं भी तो विश्वास के लायक नहीं था इस बात से भी इंकार नहीं था
मैं सब कुछ जान और समझ भी जाऊं तो मुझे क्या मिल जाएगा
ऐसा तो नहीं है कि मुरझाया फूल आज फ़िर से खिल जाएगा
काश कि मैं यूं हर किसी की बातों न आकर ख़ुद को बदमान करूं
जो मुझे मिलना है बस उसी दिशा में सकारात्मक काम करुं
मैं सही तुम ग़लत तुम सही मैं ग़लत इन सबके परे चलते हैं
जहां नभ क्षितिज से मिले ऐसे कहीं गंतव्य पर चलते हैं 
चलो सूरज से नज़रें मिलने की फ़िर एक कोशिश नाक़ाम करते हैं
अब जो कुछ भी उसे न छुपाकर सब कुछ सरेआम करते हैं
चलो एक बार फ़िर से वो टूटने वाला विश्वास कर लेेते हैं
चलो एक बार सब कुछ सही होने का एहसास कर लेते हैं ।

Monday, March 26, 2018

जनमानस और मेरी कविता

रचना उसकी अति सुंदर है
मौलिकता उसका आधार सदा
जनमानस से गहरा नाता
करता सबका आभार सदा ।

मुखमंडल उसका अति तेजवान
रवि किरणों से फैला जाता
दुःख दर्द सभी के घावों को
निःस्वार्थ प्रेम सहला जाता ।

उसकी रचना के भावों से
कविता का मुख खिल जाता है
प्यासी धरती कर हरी भरी
नभ को भी वह भाता है ।

रचना में मैं न दिखता है
जन जीवन पर विचार रहा
शांत सरल सी रचना में
हर पीड़ा का उपचार रहा ।

ईश्वर उसको शक्ति देगा
उसे नहीं अब रुकना है
हो विकट समस्या भी कितनी
उसे नहीं अब झुकना है ।

नहीं तनिक दूर समय वह
जब नभ में छा जाएगा
अपनी कविता के अमृत को
जन जन पर बरसायेगा ।

एक कदम

पिछले कुछ महीनों में एक बात तो समझ में आ गयी कि इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है। और स्थायित्व की कल्पना करना, यथार्थ से दूर भागने जैसा ह...