Sunday, March 4, 2018
हां शायद तुमने देखा हो ।
Saturday, March 3, 2018
मैं भी चाँद सितारे हूँ
Friday, March 2, 2018
बस मेरी यही कहानी है
Monday, February 26, 2018
एक दृश्य
इक नगर भ्रमण पर निकला मैं
Sunday, October 29, 2017
जिसके पीपल की छांव तले
उस चौबारे के सूनेपन में
जिसकी मिट्टी भाती थी
हमें ख़ूब अपने बचपन में
बहुत दूर का सफ़र हुआ यह
अब उस चौबारे को पाँव चले
तब ढेरों सपने पलते थे
जिसके पीपल की छांव तले ।
क्या पाया क्या खोया है
वही फ़सल है बस अपनी
जिसको हमने न बोया है
थक हार के बैठें है जब भी
मन उस बचपन के गाँव चले
तब ढेरों सपने पलते थे
जिसके पीपल की छांव तले ।
उस मिट्टी से ही फ़ैले हम
उस मिट्टी से ही साफ़ हुए
और उससे ही थे मैले हम
फ़िर से अब वह बारिश हो
जिसके पीपल की छांव तले ।
Saturday, October 28, 2017
दो राहें थी इक घर को इक सपनों की ओर चली
अंधियारे को मिटते देखा था बस एक किरण सूरज की से
साख बदलते देखा था क्षण भर में मन की गर्मी से
चिड़ियों की गुंजन मद्धम थी कुछ सावन की हरियाली थी
आजीवन ना मिटने वाली एक साख गजब बना ली थी
क्षणभर में बाजी यूं पलटी किस्मत मुझसे मुंह मोड़ चली
दो राहे थी इक घर को इक सपनों की ओर चली ।
था कठिन समय वह निर्णय का सब कुछ उस पर था टिका हुआ
उस ईश्वर से आस उसी के आगे सिर था झुका हुआ
क्षण भर को राह वही देखा जिस पर से मैं हो आया था
शून्य से लेकर शिखर आज मैंने ख़ुद को पंहुचाया था
बचपन को एक बार सोचा स्मृति मुझको झगझोर चली
दो राहे थी इक घर को इक सपनों की ओर चली ।
बचपन में जो भी सोचा था वह आज पूर्ण हो आया था
सपनों वाली राह पे अपनी आगे ख़ूब निकल आया था
न हो विस्मृत कोई, न तप , न प्रयास किसी का
धन्य है जीवन यह जिससे , यह जीवन है मात्र उसी का
मां की ममता करके मुझको भाव विभोर चली
दो राहे थी इक घर को इक सपनों की ओर चली ।
सबकी उम्मीदें पूर्ण हुई सपने सबके साकार हुए
ईश्वर के मुझपर अविस्मरणीय उपकार हुए
सबको खुश करने का सपना मेरा बचपन से था
कुछ करने का एक जुनून सर पर मेरे छुटपन से था
सबकी ममता सपनों को करके मेरे कमज़ोर चली
दो राहे थी इक घर को इक सपनों की ओर चली ।
लौटा आज स्वयं मैं फिर बचपन की हरियाली में
चेहरे को छूती थीं बूंदे काली घटा निराली में
इक लंबी अवधि बीत गयी जब माँ ने ख़ूब खिलाया था
आँचल से ढककर लोरी गाकर गोदी में हमे सुलाया था
मां की लोरी फिर से कानों में करके शोर चली
दो राहे थी इक घर को इक सपनों की ओर चली ।
Monday, October 23, 2017
चलो अब तुम रहने दो
एक कदम
पिछले कुछ महीनों में एक बात तो समझ में आ गयी कि इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है। और स्थायित्व की कल्पना करना, यथार्थ से दूर भागने जैसा ह...
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पिछले कुछ महीनों में एक बात तो समझ में आ गयी कि इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है। और स्थायित्व की कल्पना करना, यथार्थ से दूर भागने जैसा ह...
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Now it's very important for me to write today. I am not sad, I am not tired, I am not hopeless, I am not even negative. I am just dying...
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हां कुछ लोगों का मैंने भी संसार उजड़ते देखा है हसीं ख़ुशी के आंगन का परिवार बिछड़ते देखा है इतनी शक्ति है मुझमें कि मैं उनका संसार ...




