Saturday, May 22, 2021

एक कदम

पिछले कुछ महीनों में एक बात तो समझ में आ गयी कि इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है। और स्थायित्व की कल्पना करना, यथार्थ से दूर भागने जैसा है। आज जबकि दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां आदमी का बचे रहना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है, ऐसे में हम सबसे बड़े हैं, हमें कुछ नहीं हो सकता, हम आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हैं आदि आदि सोचना भी हमारी नासमझी का सटीक उदाहरण है।

दुनिया प्रेम से चलती है। इसलिए दुनिया में प्रेम होना बहुत जरूरी है। इंसान होने के नाते हमारा सबसे पहला और बड़ा धर्म यही है कि हम प्रेम करें। प्रेम इंसानों से, जगहों से, पेड़ों से, नदियों से, पहाड़ों से और हर उस चीज से जो इस दुनिया में उपस्थित है।

प्रेम के बिना जीवन की कल्पना करना बेकार है। एक बार के लिए अगर सोचा भी जाए तो कल्पना कीजिए कि हम एक ऐसी दुनिया में हैं जहां घृणा का बोलबाला हो, जहां जानबूझकर एक दूसरे को गिराने की जद्दोजहद चल रही हो, जहां एक रोते हुए आदमी से कोई उसका कारण न पूछ रहा हो, जहां अनायास ही किसी को देखकर कोई मुस्कुरा न रहा हो, जहां सब अपने अपने स्वार्थ सिद्धि में लगे हों, जहां अंधाधुंध पेड़ काटे जा रहे हों, जहां नदियों को आंख बंद करके गंदा किया जा रहा हो, जहां कोई किसी की खोज खबर न ले रहा हो....... ऐसे दुनिया में रहना कितना मुश्किल होगा।

अरे...... हम ऐसी ही किसी दुनिया में अभी भी रह रहे हैं ना? अगर आपके मन में इस सवाल का जवाब हां है तो इस दुनिया को बेकार बनाने में आपका भी योगदान है।

ऐसा नहीं है कि हम इस दुनिया को खूबसूरत नहीं बना सकते, ऐसा भी नहीं है कि हम प्रेम नहीं कर सकते.... जरूरत है तो उठकर खड़े होने की और बस एक सिर्फ एक कदम चलने की। एक कदम चल देने भर से, इस दुनिया की सभी दूरियों को ख़तम किया जा सकता है। 

मुझे उम्मीद है, आप एक कदम जरूर चलेंगे। एक कदम...... बस एक।

Sunday, May 16, 2021

एक छोटी सी चिट्ठी


एक उम्र बीत गयी। कोई नई चिट्ठी नहीं आयी। आखिरी बार खत कब आया था, याद नहीं। शायद लोगों के पास अब वक्त नहीं, जो भी हो लोग अब किसी को चिट्ठी नहीं लिखते।

मुझे नहीं पता कि दुनिया इतना तेज़ी से कैसे और क्यों बदल गयी। लेकिन दुनिया के इतनी तेज़ी से बदलने में हमसे बहुत कुछ छूट गया। यादें कुछ देर साथ चली, फिर धीरे धीरे उनपर भी धूल जमने लगी। अब पुरानी यादें भी ज़हन में कहीं दफ़न हैं। उनकी आवाज़ भी अब हम तक नहीं आती। 

आख़िरी बार आंधी आने पर हम बाग की तरफ कब भागे थे? आख़िरी बार नानी के घर जाते हुए गांव से पहले वाले पेड़ को देखकर कब खुश हुए थे? आख़िरी बार कब मां की गोद में सर रखकर सोए थे? कब आख़िरी बार बाबूजी से बाज़ार जाने की जिद की थी? 

ऐसा नहीं है कि यह सब बचपन में की जाने वाली चीजें हैं, ऐसा भी नहीं है कि अब हम यह नहीं कर सकते, बात सिर्फ इतनी है कि हमने बदली हुई दुनिया को अपनी असली मानकर अपनी असली दुनिया को लगभग ख़तम कर दिया। 

हमें यह जरूर याद होगा कि काम के दवाब के चलते हमने आख़िरी कौन सी चीज तोड़ी थी? यह भी याद होगा कि आखिरी बार किस पर और क्यों चिल्लाए होंगे? यह भी याद होगा कि पढ़ाई में आख़िरी बार निराशाजनक परिणाम आने पर हमने किसे किसे दोष दिया होगा? 

असल में हम इंसान अपनी वास्तविकता को छोड़कर बाकी सब कुछ कर लेते हैं। हम खुशियों में नहीं नाचते, रोने पर किसी को गले नहीं लगाते, जीतने पर नहीं उछलते, लेकिन छोटी सी हार पर उदास जरूर हो जाते हैं। दरअसल हम यह भूल जाते हैं कि हमारी जिंदगी परिस्थितियों से नहीं बल्कि हौसलों से, प्यार से और अपनेपन से चलती है। 

अगर हम खुशियों में नाच पाएं, रोने पर किसी को गले लगा पाएं और जीतने पर उछल पाएं तो यकीन मानिए यह दुनिया हमारी सोच से ज्यादा खूबसूरत है। 


(पी.एस: मुझे चिट्ठियां बहुत पसंद हैं। लेकिन मेरे पास लिखने वाले लोग नहीं हैं। उम्मीद है आपको भी चिट्ठियां पसंद होंगी, इसलिए आपके नाम मेरी यह एक छोटी सी चिट्ठी)

Friday, September 13, 2019

I am lost.

"It is not necessary to be in front of people all the time.  Sometimes staying back also serves your purpose. If your objective is being fulfilled then it should not be necessary to show your work to the people during the whole episode. Reality can never be changed. You can ignore the truth, hide it, but you cannot end its existence. It does not make any sense how you did it, what you did matters. You should always have a harmony with yourself. What people say about you should not matter to you. You can't satisfy everyone.  Actually you don't even need it. You can never change people's perspective. In such a situation, it would be appropriate to remain focused towards the goal. Who is getting what is not a matter of discussion, what you contributed to someone's development matters. It is human religion to help people selflessly. Do what is right rather than what people believe to be right. Talk to yourself, You will feel good. You will find the solution to all your problems."

Thursday, July 18, 2019

I am Dying..

Now it's very important for me to write today. I am not sad, I am not tired, I am not hopeless, I am not even negative. I am just dying. Dying to talk to me, dying to open myself, dying to cry, dying to explain myself .What you can do for me? Can offer me some pain killer or a little bit of poison? Your answer might be no or it can be yes also. So what if your answer is yes ? Again here a question and the question is "what" ? Finding difficult to understand or you don't want to understand? So what if you don't want to understand? Again a question "what" ? I am not begging your sympathy so don't need be rude with me . I want to teach you something. I am you. Try to see me. Let's see what will you found. There are two cases either you will loss yourself or you will find me. Read it once again, either you will lose yourself OR you will find me.

Tuesday, April 23, 2019

विश्वास

एक मामूली सा शब्द 'विश्वास' कितनी गहरा असर छोड़ जाता है । अलग अलग लोगों के लिए यह शब्द अलग अलग मायने रखता है । विश्वास कोई वस्तु नहीं कि किसी को दे दिया जाए या किसी से ले लिया जाए यह एक भाव होता है जो मन में स्वतंत्रता के बाद जन्म लेता है । कौन आप पर या आप किस पर विश्वास कर रहें हैं इससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि किस परिस्थिति में आप वह विश्वास कर रहे हैं । तमाम बार परिस्थितियां मज़बूत हौसलों को भी तोड़ने में कामयाब हो जाती हैं , इसमें हमारी ही कमी होती है और वह है विश्वास की कमी । जब तक हमें हमारे कदमों पर विश्वास है कोई भी उन्हें डगमगा नहीं सकता । सोचिए ! ऐसा ही विश्वास आप पर कोई कर रहा है । इस भौतिकतावादी संसार में आपको कहने के अनगिनत लोग मिल जाएंगे जो कहेंगे उन्हें आप पर पूर्ण विश्वास है । इन्ही सब बाह्य आडम्बरों के बीच एक ऐसा सख़्श  होता है जो आप पर अटूट विश्वास किये है , आपके बढ़ते रहने पर विश्वास, आपकी जीत पर विश्वास, आपके काम पर विश्वास । शायद उस सख़्श को ख़ुद पर ऐसा विश्वास न हो जैसे वह आप पर करता है । कई दफ़ा हम हताश हो जाते हैं लेकिन वह हममे एक नया ज़ोर भरता है । वो पिता होता है जो दिल की गहराइयों से आप पर विश्वास किये है । मां एक पल के लिए भावुक हो सकती हैं पर पिता कभी नहीं । मां के आंसू सभी ने देखे होंगे लेकिन पिता की नम आंखें शायद ही कभी देखी हों । ऐसा नहीं है वह कमज़ोर नहीं है पर उसे पता है कि अगर वह कमज़ोर हुआ तो शायद हम भी हो जाएं इसलिए बिना किसी से कुछ कहे वह ख़ुद में एक अगल दुनिया बताना जाता है । कभी समय मिले तो उस दुनिया में जाने की एक कोशिश जरूर करना , निःसंदेह वहां की सारी खुशियों पर बस आपका नाम होगा । कई दफ़ा आपको पता भी नहीं होता है कि आपकी जरूरतों और ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए वो कितनी दूर चला । एक खिलौनों को ख़रीदने के लिए क्या कुछ नहीं किया । कभी समय मिले तो अपने पिता से एक दफ़ा उनके ही लहज़े में बात करना , दुनिया की आधी ख़ुशी आपको सिर्फ़ उन्हें सुनने से मिल जाएगी ।

सम्पूर्ण पितृशक्ति को समर्पित........

Friday, March 8, 2019

Towards Infinity

Negative thoughts come in everyone's mind. Who is not depressed or who is not disappointed. The attitude of seeing life is different for everyone. I believe life is a journey, may be your prospective might be different. I am looking for a solution to countless questions and the most ridiculous thing is that I have not been able to reach those questions whose answer I am in search of. This is the most difficult task in human life when he does not know where to go, but to continue walking. Somewhere this is life. I am also going through a similar situation today. I'm looking for something but what? I am also in search of this 'what'? It is not that I am sad or I am depressed. I am not even disappointed. I am not even a victim of negativity. I am just looking for ............ looking for myself. I want to go to infinitely in dim yellow light. I do not have to wait. Just have to go. To go.... Till infinity..... (Contd...)

Monday, March 4, 2019

बदलाव

व्यक्ति के जीवन में किस चीज का कितना महत्व है और वह उसे किस तरह से महत्व देता है, यह देखना बड़ा दिलचस्प होता है । आवश्यकता के अनुसार महत्त्व या महत्व के अनुसार आवश्यकता यह व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करता है । संभावनाएं तब तक व्यक्ति के साथ होती हैं जब तक वह जीवित है । हर क्षण नई संभावनाएं जन्म लेती हैं । चूंकि समय अनंत है अतैव संभावनाएं भी अपार हैं । विवेक से संभावनाओं का उचित प्रयोग करना सफलता के कुछ मूल मंत्रों में से एक है । कोई व्यक्ति किसी से कमजोर नहीं है । हर व्यक्ति सफलता के सर्वोच्च शिखर तक जा सकता है किन्तु कुछ भी करने से पहले उस पर विचार करना उससे जुड़ी हरेक संभावना पर भी दृष्टि डालना आवश्यक होता है । समय कहां और किसे मात दे दे यह सिर्फ समय को पता होता है और अगर आपको यह देखना है तो समय के साथ चलिए । इस ब्रह्मांड में सिर्फ़ समय है जो नियत है और निरंतरता इसकी नियति । 'बदलाव' समय का एकमात्र गुण है जो उसे अमूल्य बनाता है । इसलिए समय से साथ बदलना अत्यंत आवश्यक है.............(ज़ारी)

Sunday, March 3, 2019

जीवन (1)

जब एक साधारण व्यक्ति के सोचने समझने की क्षमता ख़त्म हो जाये, क्या करना उचित होगा और क्या अनुचित; जब इनमें भेद करना नामुमकिन सा लगने लगे, जब साफ़ रास्ते भी धुंधले दिखें और जब एक भय मन में इस तरह आ जाये कि वह आपको कुछ करने से रोकने लगे तब यह नकारात्मकता की स्थिति होती है । तमाम बार हमारे नकारात्मक विचार हमारी सकारात्मकता पर ज़्यादा प्रभावी हो जाते हैं । ऐसे में कोई क्या करे जब उस पर नकारात्मकता हावी हो । जब रास्ते साफ़ न दिखाई दे रहे हों तब कोई क्या करे ? ऐसे अनगिनत प्रश्न हैं जिनका उत्तर तो हमारे सामने ही होता है लेकिन वो हमें दिखाई नहीं देता । अंधेरा कितना भी घना क्यों न हो प्रकाश की एक छोटी सी किरण ही उसे चीर देती है । नकारात्मकता भी वही घना अंधेरा होता है जिसे सकारत्मकता की एक छोटी किरण ख़त्म कर सकती है । किन्तु नकारत्मकता की उस स्थिति में एक भी सकारात्मक विचार नहीं आ पाते, ऐसे में क्या किया जाए ? कभी हमने उस वृक्ष के बारे में सोच है जो पत्थर को चीरकर निकलता है या कभी उन लहरों के बारे में जो सतत और अथक प्रयास से पत्थर को भी काट देती हैं । तमाम बार वह हर कुछ हमारे सामने होता जिसकी हमें तलाश होती है किंतु हम इतने निराश होते हैं कि हम वह सब कुछ देख ही नहीं पाते । हर विषम परिस्थिति में अपने आप को शांत रखना प्रकृति में पूर्ण आस्था रखना और आने वाले कल में अटूट विश्वास रखना ही सकारात्मकता तक ले जाने का एकमात्र उपाय है । हर विषम परिस्थिति में धैर्य बनाए रखना, सकारात्मकता के साथ उसका हल ढूढ़ना और प्रकृति पर विश्वास रखते हुए साधना पथ पर चलते जाना ही जीवन है..............(जारी)

Saturday, March 2, 2019

आत्म संवाद (1)

क्यों न फ़िर से एक नई कहानी शुरू की जाए । क्यों न फ़िर से एक दूसरे से जुड़ने का ज़रिया निकाला जाए । क्यों न शाम को चौपाल पर बैठकर सबका दुःख दर्द बांटा जाए और क्यों न अपने अंदर के मानवीय गुणों को बाहर निकाला जाए । हम दूसरों से अपेक्षा क्यों करते हैं ? क्या सिर्फ़ इसलिए कि हम मदद स्वयं करने के योग्य नहीं या हम पूरी तरह दूसरों पर निर्भर होना चाहते हैं ? क्यों न कुछ ऐसे प्रश्नों के हल ढूंढने के प्रयास किया जाए जो सिर्फ़ हमें पता है । अगर हम अपने प्रति ईमानदार नहीं हैं तो हम दूसरों के ईमानदार होने की कल्पना भी कैसे कर सकते हैं । बुराईयां और परेशानी कहां नहीं है ? अगर जीवन में उतार चढ़ाव नहीं है तो कैसा जीवन ? चलो ख़ुद से एक प्रश्न करते हैं कि क्या हम वास्तव में वही हैं जो हमें देख या समझ रहे हैं ? क्या हम वास्तव में वही कर रहे हैं जो हमें करना था ? क्या हम उसी राह पर हैं जो हमें हमारी मंज़िल तक ले जाएगी ? ऐसे न जाने कितने प्रश्न हैं जिनका उत्तर खोज़ना शायद बेहद जरूरी है । तो क्या हम अपने निर्माण की राह पर हैं या हमें स्वयं को तलाशने की आवश्यकता है ? आत्म संवाद अत्यंत आवश्यक है । कुछ पल के लिए स्वयं को इस भौतिक संसार से अलग मानकर क्यों न इन प्रश्नों के उत्तर की तलाश की जाए ? या जीवन सिर्फ़ अपेक्षाओं पर चलेगा ? शायद स्वयं का निर्माण नितांत आवश्यक है । क्यों न एक यात्रा स्वयं के तलाश की हो..............(जारी)

Monday, May 21, 2018

मैं वेदना की गहराई लिखता हूं

शब्द मेरे हम इंसानों सा रोते हैं
मैं वेदना की गहराई लिखता हूं ,

उजाले में हर कोई साथ चलता है
अंधेरों में भी मैं परछाई लिखता हूं ,

अपने दुःख में मैं चुप हो जाता हूं
दूसरों के सुख में शहनाई लिखता हूं ,

मैं चुप होके भी कुछ कह जाता हूं
ऐसे एहसासो की करिश्माई लिखता हूं ,


जो न हो सबके हित और पक्ष में
ऐसी वृद्धि को मैं महंगाई लिखता हूं ,

उजालों तक ही हों जो सीमित कदम
इसको ही स्वार्थ पूर्ण हिताई लिखता हूं,

जहां पवित्र हो जाये आत्मा मिले शांति
उनको ही मैं सावन रमजायी लिखता हूं ,

जहां न हो भेदभाव न कोई ऊंच नीच
ऐसे व्यवहार को प्रभुताई लिखता हूं ,

दिल का सरल होना भी बेहद जरूरी है
सबके हृदयं में एक नरमाई लिखता हूं ,

बात जहां हो सम्मान के रक्षा की
उस स्थिति में मैं कड़ाई लिखता हूं ,

कठिन परिस्थितियों में सरल व्यवहार
ऐसे मनः दशा को चतुराई लिखता हूं ,

मैं इंसानों को भी पर दे दूं परिंदों सा
फ़िर आकाश कोअनंत ऊंचाई लिखता हूं ,

जहां से करें मानवता का अमृतपान हम
गुरुबान क़ुरान गीता व चौपाई लिखता हूं ,

मानव सेवा ही मेरा धर्म रहा सदा से ही
मैं तो रब ख़ुदा ईश रघुराई लिखता हूं

अच्छों के साथ अच्छा बुरों के साथ भी
देखा हरदम अच्छा है न बुराई लिखता हूं ,

जिस मचान पर ठिठुर गयी ख़ुद सर्दी भी
उस ठिठुरन को ही मैं रज़ाई लिखता हूं ,

जब स्वार्थ ही नींव हो जाये रिश्तों की
फ़िर इनसे मैं बेहतर तन्हाई लिखता हूं ,

जब भी निराश हो झगझोर दे मन को
एहसासों की ऐसे में गरमाई लिखता हूं ,

इस विस्तृत भू भाग की संरचना है अद्भुत 
पहाड़ों की ऊंचाई कहीं राई लिखता हूं ,

एक ऐसा स्वरूप जिसमे है निःस्वार्थ प्रेम
मां माता अम्मी कहीं माई लिखता हूं

बेनक़ाब चेहरों पर रंग नहीं चढ़ते हैं
सादगी को भी अलग रंगाई लिखता हूं ,

अपने दर्द में मैं चुप चाप रो लेता हूं
फ़िर दूसरों के दर्द की दवाई लिखता हूं ,

जहां बांध दे दीवारे चलने से हमें
वहां कुछ मार्ग हवाई लिखता हूं ,

तूफ़ानों की भीअपनी एक कहानी होती है
हवा के रुख़ को पुरवाई लिखता हूं ,

कुछ विरोभाष मन में जो छिपे हैं
मैं ऐसे विचारों की सफ़ाई लिखता हूं ,

खेल कभी कुछ एहसासों को तोड़ते है
मैं कुछ खेल तमाशाई लिखता हूं ,

जहां टूट जाये उम्मीद और हार जाएं हम
वहां मैं विश्वासों की भराई लिखता हूं ,

गिर जानेपर भी पेड़ों में शाख निकलती है
इसको ही क़ुदरत कीरहनुमाई लिखता हूं ,

इस प्रकृति का रहस्य अनन्त है यहाँ
कहीं नदियां पहाड़ कहीं खाई लिखता हूं ,

गलतियों को मैं अपनी कभी नहीं छुपाता
कभी हिसाब तोकभी भरपाई लिखताहूं ।

Sunday, April 8, 2018

एक लड़की है जो किसी को समझ नहीं आती है

अपने सरल भावों से वह सबके मन को भाती है
चुप रहकर भी न जाने क्या कुछ कह जाती है
अपनी हर ज़िद पर वह ख़ुद को ख़ुद ही बहलाती है
अपने हर सपने को बड़े प्यार से वह सहलाती है
अपनी उदासियों पर वह ख़ुद को ख़ुद ही समझाती है
अपनी ख़ुशबू से पूरे जहान को वह महकती है
अपनी उदासी को बड़े चालाकी से वह सबसे छुपाती है
एक लड़की है जो किसी को समझ नहीं आती है ।



वो रोती है फ़िर भी न जाने कैसे मुस्कुराती है
पल भर में ही वह किसी हवा सा बह जाती है
अपनी गलतियों को वह कभी नहीं छुपाती है
अपने अच्छे हुए कामों पर बस जरा सा मुस्कुराती है
किसी उदास को देख के ख़ुद भी उदास हो जाती है
कभी कभी अपने ही ख़यालो में वो खो जाती है
अपनी ठोकरों पर वह ख़ुद ही संभल जाती है
एक लड़की है जो किसी को समझ नहीं आती है ।

किसी के देखने से छुप और छूने से बिख़र जाती है
जब ख़ुश होती है तो भीड़ में भी निखर जाती है
कुछ पूछो तो उससे पहले ही चुप हो जाती है
बस एक निःस्वार्थ मुस्कान लेकर मुस्काती है
बस कभी कभी वह अपनी कहानियों को सुनाती है
अपने किसी भी दर्द को वह किसी से नहीं बताती है
एक लड़की है जो किसी को समझ नहीं आती है ।

Wednesday, April 4, 2018

मैं तप कर फ़िर अंगार बनूं

मैं नहीं चाहता जग में फ़िर
कहीं अलंकित नाम रहे
शांत सरल मृदुभाओं से ही
जगत प्रकाशित काम रहे
हो स्वेत वस्त्र सा मन मेरा
मैं विधवा का श्रृंगार करूं
मन को मैं उन्मादित करके
मैं तप कर फ़िर अंगार बनूं ।

चंदन का पुष्प सुगंधित हो
तन मन जग को वह महकाये
हो वायु सुगंधित भी उससे
हर मन को फ़िर वह बहलाये
मन के मलीन हर भावों का
सकुशल मैं भंगार बनूं
जीवन को आत्मसमर्पित कर
मैं तप कर फ़िर अंगार बनूं ।

सकुशल नीरव रस का प्रवाह
सुखी सरिता के जीवन में
पतझड़ का मौसम ही ठहरे
मेरे मन के सूखे वन में
मैं मन के अपने भावों का
अभेदित कारागार बनूं
प्रेम सहित सरिता वन फैले
मैं तप कर फ़िर अंगार बनूं ।

जीवन में प्रेम नहीं जिनके
मन उनका भी अनुरागी है
हो प्रेम यज्ञ का अनुष्ठान
हर जन उसमें प्रतिभागी है
इस प्रेम यज्ञ के अनुष्ठान में
मैं उसका सभागार बनूं
प्रेम प्रेम को कर आलंगित
मैं तप कर फ़िर अंगार बनूं ।

Monday, April 2, 2018

मेरे एहसास

मुझे नहीं पता था कि अपने दिखावे में मैं अपना अस्तित्व खो दूंगा
अपने अहंकार में कभी न पनपने वाले ऐसे भी बीज बो दूंगा
मुझे अब तक ऐसा नहीं लगता था कि मेरे साथ कुछ ऐसा हो सकता है
जो चीज़ उसकी हो ही न उसे कोई भला कैसे खो सकता है
कुछ बातें जो मुझे नहीं जाननी थी वो भी समझ आने लगीं थीं
हर बात के हमें एक अगल ही मायने समझा जाने लगीं थीं



मैंने कभी किसी से नहीं कहा कि मैं सर्वदा सही हूं
मैंने लोगों को जो कुछ भी  दिखाया है मैं वही हूं
किसी की भावनाओं के साथ खेलना मेरा पसंदीदा खेल तो नहीं
कोशिश करे औरसमझ पाए कोई इतना भी उलझा मैं बेल तो नहीं
निःसंदेह कहीं न कहीं यह मेरी ही कोई गलती बड़ी रही होगी
यूं ही नहीं क़िस्मत सिर्फ़ मेरे ही लिए उस मोड़ पर खड़ी रही होगी
मैं रास्तों को अपनी मंज़िल समझ कर रुक गया था सुस्ताने के लिए
हां नहीं पता था बहाने को भी जरूरत होती है बहानो के लिए
चलो मैं तो ग़लत था कुछ समझदारी तुमने ही दिखाई होती
कुछ बातें जो मुझे ग़लत पता थी तुमने तो सही बताई होती 
मैं मानता हूं कि मेरा विश्वास एक पल के लिए हिल गया था
मगर उस पल को भी तो बस वही एक पल मिल गया था
मैं लाख कोशिशों के बाद भी कई बातें मानने के लिए तैयार नहीं था
मैं भी तो विश्वास के लायक नहीं था इस बात से भी इंकार नहीं था
मैं सब कुछ जान और समझ भी जाऊं तो मुझे क्या मिल जाएगा
ऐसा तो नहीं है कि मुरझाया फूल आज फ़िर से खिल जाएगा
काश कि मैं यूं हर किसी की बातों न आकर ख़ुद को बदमान करूं
जो मुझे मिलना है बस उसी दिशा में सकारात्मक काम करुं
मैं सही तुम ग़लत तुम सही मैं ग़लत इन सबके परे चलते हैं
जहां नभ क्षितिज से मिले ऐसे कहीं गंतव्य पर चलते हैं 
चलो सूरज से नज़रें मिलने की फ़िर एक कोशिश नाक़ाम करते हैं
अब जो कुछ भी उसे न छुपाकर सब कुछ सरेआम करते हैं
चलो एक बार फ़िर से वो टूटने वाला विश्वास कर लेेते हैं
चलो एक बार सब कुछ सही होने का एहसास कर लेते हैं ।

Monday, March 26, 2018

जनमानस और मेरी कविता

रचना उसकी अति सुंदर है
मौलिकता उसका आधार सदा
जनमानस से गहरा नाता
करता सबका आभार सदा ।

मुखमंडल उसका अति तेजवान
रवि किरणों से फैला जाता
दुःख दर्द सभी के घावों को
निःस्वार्थ प्रेम सहला जाता ।

उसकी रचना के भावों से
कविता का मुख खिल जाता है
प्यासी धरती कर हरी भरी
नभ को भी वह भाता है ।

रचना में मैं न दिखता है
जन जीवन पर विचार रहा
शांत सरल सी रचना में
हर पीड़ा का उपचार रहा ।

ईश्वर उसको शक्ति देगा
उसे नहीं अब रुकना है
हो विकट समस्या भी कितनी
उसे नहीं अब झुकना है ।

नहीं तनिक दूर समय वह
जब नभ में छा जाएगा
अपनी कविता के अमृत को
जन जन पर बरसायेगा ।

Sunday, March 18, 2018

मानवता का आधार

इक छवि थी रवि सी चमक रही
मृदु भावों से व्यवहार रहा
स्वच्छ हृदयं स्वछंद वेग
मन मानवता का आधार रहा
                            मन में उसके कुछ भाव छुपे
                            स्पष्ट उसे न करता था
                             मन के भीतर सहज भाव से
                             सौ बातों को भरता था
मौलिकता शायद आधार बना
स्वछंद मार्ग पर बढ़ता जाता
भले सफ़ल असफ़लता होती
स्वर्ण शिखर पर चढ़ता जाता
                           जनमानस से गहरा नाता
                           मन में अटूट विश्वास भरा
                           हो सफ़ल सफ़लता तो अच्छा
                           असफ़लता भी प्रभास रहा
कल को जब रजनी बीतेगी
चिड़ियों का फ़िर गुंजन होगा
वह दिनकर अति अभिमानित होगा
जिसमें उसका अभिनंदन होगा ।

Thursday, March 15, 2018

चलो फ़िर नए आशियाने बना लें

सुलगती हुई धूप में भी चलें हम
गुजरते हुए पलों में भी मिलें हम
बदलने के कुछ तो बहाने बना लें
चलो फिर नए आशियाने बना लें ।

मैं ठहरूं कहीं तो लगे छाँव तेरी
हो सब कुछ प्रकाशित या रातें अंधेरी
चुप हों कहीं या कहीं गुन गुना लें
चलो फिर नए आशियाने बना लें ।

क्या बीता क्या गुजरा क्या होने है वाला
भूंखा है कौन और किसका निवाला
तो कल के भी चल के तराने बना लें
चलो फिर नए आशियाने बना लें ।

जीवन है पहिया बदलते समय का
स्वार्थ से भरा जमाना है "मैं" का
चलो प्यार के भी ठिकाने बना लें
चलो फिर नए आशियाने बना लें ।

Tuesday, March 13, 2018

मैं नभ का विस्तार बनूं

हां कुछ लोगों का मैंने भी
संसार उजड़ते देखा है
हसीं ख़ुशी के आंगन का
परिवार बिछड़ते देखा है
इतनी शक्ति है मुझमें कि
मैं उनका संसार बनूं
यही प्रार्थना अन्तर्मन से
मैं नभ का विस्तार बनूं ।
                                    जहां कहीं भी जीवन प्यासा
                                    बूंदे बनकर मैं गिर जाऊं
                                    अगर कमी उम्मीदों में है
                                    दीपक बनकर मैं आ जाऊं
                                    मन को इतना दृढ़ कर लो
                                    फ़िर दृढ़ता का आधार बनूं
                                    खड़ी पहाड़ी समतल होगी
                                    मैं नभ का विस्तार बनूं ।
सागर की लहरों से डरकर
ख़ुद को पीछे तुम मत करना
कदम भले ही पीछे जाएं
ख़ुद में तुम यूं साहस भरना
तुम सरिता में नाव चलाओ
मैं उसकी पतवार बनूं
लहरें फिर हो ऊंची क्यों न
मैं नभ का विस्तार बनूं ।

Sunday, March 11, 2018

जाने अनजाने में

चिड़ियों की आवाजें भी बदली
                                     मौसम की हरियाली भी
बरखा की बूंदे भी बदली
                                      सावन घटा निराली भी
कई जमाने यूं ही बदले 
                                     खड़े खड़े बतियाने में
कितना सब कुछ बदल गया
                                    जाने अनजाने में ।


मैं चातक पक्षी को भी
                                    आसमान में ढूढ़ रहा
चका चौंध और भागदौड़ में
                                     मैं किंकर्तव्यविमूढ़ रहा 
नहीं जमाने चलते बीते
                                    बदल गया सुस्ताने में
कितना सब कुछ बदल गया
                                    जाने अनजाने में ।


बच्चों की मुस्कानें में ही
                                    मैंने ख़ुशी सदा पायी है
मीठी प्यारी प्यारभरी 
                                    आवाजें मन को भायी है
हंसना बदल गया रोने में
                                    गुड़ियों से फुसलाने में
कितना सब कुछ बदल गया
                                    जाने अनजाने में ।


मां की लोरी सबसे प्यारी
                                    वही रही थी बचपन में
इतना शोर शराबा है
                                    वह दबी रह गयी मेरे मन में
मां की लोरी दबी रह गयी
                                    गाने और बजाने में 
कितना सब कुछ बदल गया
                                    जाने अनजाने में ।


कुछ साथ मिले कुछ गए
                                    किसी से अच्छा ख़ासा पाठ लिया
कुछ से छूटे दमन फिर कहीं
                                    किसी का साथ मिला 
कौन मिला और कितने छुटे
                                    स्वार्थ सहित ज़माने में
कितना सब कुछ बदल गया
                                    जाने अनजाने में 


Wednesday, March 7, 2018

फ़िर शब्दों से मैंने खेला

गहन उजाली पसर रही थी
बहती सरिता के तीरों पर
श्वेत चांदनी उलझ रही थी
गुज़र रहे राहगीरों पर ,
सरिता में लगते देखा फिर
चाँद-चांदनी का मेला
अति सुंदर वह पहर रहा
फ़िर शब्दों से मैंने खेला ।

मनमोहक अति वह दृश्य रहा
रजनी रति भी झलक रही
प्रेम सहित आलिंगन हो
रजनी की भी यह ललक रही,
पल भर को ही वह पहर रहा
फ़िर बीत रही रजनी बेला
मन से मन में था शांत रहा
फ़िर शब्दों से मैंने खेला ।

सरिता लहरों पर चंचल क्रीड़ा
नभ से बरस रहा श्रृंगार
राग मिलन सरिता से फ़िर
इस स्मृति का मन पर प्रहार,
इस पल को कर तन्हाई में
क़दम बढ़ा मैं चला अकेला
मद्धम सरिता पर तेज़ हवा
फ़िर शब्दों से मैंने खेला ।


Tuesday, March 6, 2018

काश !

काश कि मैंने उस रात तुम्हारी बात मान ली होती
और ज़ी भरके तुम्हें यूं न देखा होता
मैं तो आज भी वहीं रह गया, पर
वो ग़लती न होती तो अनदेखा न होता ।

कह दो कि तुम चाहते थे मैं तुम्हे न देखूँ
फ़िर क्यों मुझे एक दफ़ा नहीं रोका था
मैं तो उन मासूम आंखों की मासूमियत देखता था
न मालूम था कि नज़रों का सबसे बड़ा धोखा था ।

माना कि मैं ग़लत था तो तुम भी अनजान नहीं थे
इरादे भले ही न सही तुमसे बेईमान नहीं थे
पल भर को मैं समझ ही नहीं पाया था
पर यूँ तुम भी तो एक पल के मेहमान नहीं थे ।

न जाने कितनी गलतियां होती रहीं है मुझसे इस ज़माने में
तुम थे सही? नहीं तुम्हारी भी यही रज़ा मंदी थी
मैं सब कुछ देख सकता हूं बंद आंखों से भी
पर उस रात मेरी खुली आंखे भी अंधी थीं ।

मैं वो न देख सका जो मुझे सच मे देखा था
जो तुमने चाहा मैं वो सब करता चला गया था
काश की तुम फ़िर कर दो सारी ग़लती तुम्हारी रही
लंबी सांसे मैं गहराई से भरता चला गया था ।

काश की तुम मुझे झूठा बनाकर खुद को बचा लो
अपनी सफाई में मैं एक शब्द भी नहीं बोलूंगा
मैंने अपनी आंखें उस रात भी नहीं खोलीं थी
मैं उन्हें आज भी नहीं खोलूंगा ।







एक कदम

पिछले कुछ महीनों में एक बात तो समझ में आ गयी कि इस दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है। और स्थायित्व की कल्पना करना, यथार्थ से दूर भागने जैसा ह...